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इंसानी खोपड़ियों से बने बर्तन, मानव त्वचा की कुर्सियां; अमेरिका का सबसे खौफनाक सीरियल किलर
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ट्रंप के टैरिफ पर भारत क्यों नहीं कर रहा है पलटवार? जानें 9 बड़ी वजह

पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप

पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप

भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ वार पिछले कुछ समय से सुर्खियों में है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'अमेरिका फर्स्ट' पॉलिसी के तहत कई देशों पर भारी शुल्क लगाए थे, जिनमें भारत भी शामिल था, लेकिन भारत ने हर बार सीधे-सीधे उसी अंदाज में पलटवार नहीं किया. मोदी सरकार ने ऐसा क्यों किया. क्या भारत ट्रंप के अंदाज में इसका जवाब नहीं दे सकता. इसका जवाब ये है कि भारत वैश्विक मामलों में कभी भी पलटवार नहीं करता. इसके पीछे कई वजह हैं, जिसे जानना जरूरी है. 
 
1. अमेरिका भारत के सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर्स में से एक है. भारत की आईटी सेवाएं, फार्मा, हीरे-गहने और कपड़ा आदि उसी पर निर्भर है. अगर भारत पलटवार करता है तो अमेरिकी बाजार खोने का खतरा है. 

2.अमेरिका और भारत सिर्फ व्यापारिक पार्टनर नहीं, बल्कि रणनीतिक सहयोग भी हैं. रक्षा सौदे, इंडो–पैसिफिक में चीन को बैलेंस करना और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर अमेरिका अहम साझेदार है. टैरिफ पर आक्रामक जवाब देने से दोनों देशों के रक्षा और रणनीतिक रिश्ते बिगड़ सकते थे.

3. भारत के कई सेक्टर जैसे-कृषि और छोटे उद्योग पहले से ही चुनौतियों का सामना कर रहे थे. अमेरिका पर टैरिफ लगाने से वहां से आयात महंगा हो जाता, जिससे भारतीय उद्योगों को नुकसान पहुंच सकता था. भारत 'विन-विन' रणनीति अपनाना चाहता था. 

4. भारत ने हमेशा "रूल-बेस्ड ट्रेड" यानी WTO (विश्व व्यापार संगठन) के नियमों का समर्थन किया है. ट्रंप का रवैया कई बार 'एकतरफा' माना गया है. जबकि भारत ने खुद को एक जिम्मेदार ट्रेड पार्टनर के तौर पर पेश किया है. ताकि वह दुनिया में 'संतुलित खिलाड़ी' दिख सके. 

5. भारत सरकार ने टकराव के बजाय बातचीत पर ज्यादा जोर दिया है. कई बार भारत ने आंशिक जवाबी टैरिफ लगाए, लेकिन पूरी तरह ट्रंप के अंदाज में पलटवार नहीं किया. 

6. भारत आईटी, रक्षा, स्टार्टअप और ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिकी निवेश और तकनीक पर काफी निर्भर है. टैरिफ वॉर से यह सहयोग प्रभावित हो सकता है. ऐसे में भारत का जवाबी टैरिफ लगाना सही होगा क्योंकि हमारा आईटी निर्यात साल 2024-25 में भारतीय 224.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें अमेरिका प्रमुख बाजार है. 

7. भारत-चीन तनाव के बीच अमेरिका, भारत के लिए रणनीतिक सहयोग की भूमिका निभा रहा है. भारत नहीं चाहता कि व्यापारिक विवाद इस साझेदारी को कमजोर करे.

8. विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के राजदूत रहे जयंत दास गुप्ता का कहना है कि अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगाने से भारत की घरेलू और निर्यात बाजारों को ही नुकसान होगा. ऐसा करने से सर्विस सेक्टर में भी नुकसान हो सकता है, जिसे टालना जरूरी है. 

9. वैश्विक मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन की तरह अमेरिका पर टैरिफ लगाना भारत के लिए आर्थिक नजरिए से फायदेमंद नहीं होगा. भारत के लिए सही रास्ता है कूटनीति, घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा. 

 भारत ने ट्रंप के टैरिफ युद्ध का सीधा जवाब न देकर रणनीतिक धैर्य दिखाया है. उसकी प्राथमिकता आर्थिक स्थिरता, रणनीतिक साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय छवि है. यही वजह है कि भारत ने ट्रंप की 'आक्रामक टैरिफ पॉलिसी' का पलटवार उसी अंदाज में नहीं किया बल्कि एक संतुलित रास्ता अपनाया.


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Written by: Dhirendra Mishra

01 Sep 2025  ·  Published: 05:45 IST

क्या नीतीश कुमार इस बार भी साबित होंगे 'X' फैक्टर?

नीतीश कुमार

नीतीश कुमार

बिहार में मतदाताओं का एक तबका सहित अधिकांश सियासी दलों के नेता चाहते हैं कि नीतीश कुमार लगातार 20 साल से बिहार के सीएम बने हुए हैं. अब किसी और को सीएम बनाने की जरूरत है. लेकिन आरजेडी और बीजेपी की सियासी मजबूरी ऐसी है कि उन्हें नीतीश कुमार को भाव देना पड़ रहा है. दोनों में से कोई भी पार्टी अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है. वैसे तो सीएम पद के दावेदार तेजस्वी यादव, सम्राट चौधरी, विजय कुमार सिन्हा और चिराग पासवान समेत कई अन्य नाम चर्चा में हैं, पर किसी पर कोई भरोसे से नहीं कह सकता है कि इनमें से बिहार जैसे जटिल जातीय समीकरण और पिछड़े राज्य का योग्य सीएम कौन साबित हो सकता है.

क्या होता है एक्स फैक्टर? 

राजनीति में एक्स फैक्टर एक अनोखी विशेषता का प्रतीक है. यह किसी व्यक्ति या संस्था को दूसरों से अलग करता है. सियासी परिणाम पक्ष में लाने में मददगार साबित होता है. हालांकि, एक्स फैक्टर को परिभाषित करना अक्सर मुश्किल होता है, लेकिन यह आमतौर पर उन व्यक्तियों में देखा जाता है जो असाधारण क्षमता या रचनात्मकता के धनी होते हैं. यह गुण अक्सर उन लोगों में देखने को मिलता है, जो सकारात्मक बदलाव, नवाचार या व्यावसायिक सफलता के समर्थक होते हैं. यही वजह है कि नीतीश कुमार बिहार चुनाव हारकर भी सियासी बाजी जीत जाते हैं. 


लालू परिवार को एंटी इनकम्बेंसी पर भरोसा 

दरअसल, सीएम नीतीश कुमार शानदार तरीके से अपनी सियासी करियर को अलविदा कहना चाहते हैं. यही बीजेपी भी चाहती है, लेकिन वो उनसे अधिकार पूर्वक यह नहीं कह पा रही है कि अब आप सीएम का पद का मोह छोड़ दें. फिर, यह चुनाव संभवतः नीतीश कुमार के करियर का आखिरी सियासी जंग है. इसके विपरीत लालू प्रसाद यादव परिवार को उम्मीद है कि 20 साल की सत्ता विरोधी लहर एक कमजोर मुख्यमंत्री को सियासी मात देने के लिए सबसे ज्यादा मुफीद समय है. 

प्रशांत किशोर के दावे पर कितना करें भरोसा?

दरअसल, सीएम नीतीश कुमार की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अब ठीक नहीं रहता है. उनके बेटे निशांत के राजनीति में आने की चर्चा को देखते हुए तेजस्वी यादव का यह दावा करते फिर रहे हैं कि नीतीश चाचा के दिन अब गिने-चुने रह गए हैं. बिहार कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी का संगठनात्मक आधार मजबूत करने में जुटी है. जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर भी दावा करते हैं कि सीएम कोई भी बने, बिहार में बदलाव तय है. वहीं नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने को लेकर भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की दुविधा ने आगामी विधानसभा चुनाव को दिलचस्प बना दिया है. 

वोट बैंक में जेडीयू का शेयर अहम 

जॉर्ज फर्नांडीस और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली समता पार्टी का 2003 में शरद यादव की जेडीयू में विलय से तीन साल पहले दोनों पार्टियों ने अविभाजित बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था. दोनों पार्टियों ने मिलकर 15.2 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था और 55 सीटें जीती थीं. साल 2005 में एनडीए ने जीत हासिल की और लालू प्रसाद यादव के 15 साल के शासन का अंत किया था. जेडीयू ने 88 सीटें और 20.5 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था. साल 2010 में इसने अपने दम पर लगभग साधारण बहुमत हासिल कर लिया था. 115 सीटें (122 बहुमत का आंकड़ा है) जीतकर 22.6 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था.

नीतीश कुमार ने साल 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा से नाता तोड़ लिया और 2015 के राज्य चुनावों में अपने धुर विरोधी लालू यादव की आरजेडी के साथ गठबंधन किया. दोनों ने रिकॉर्ड बहुमत हासिल किया. हालांकि, जेडीयू की सीटों की संख्या घटकर 71 रह गई और उसका वोट शेयर घटकर 17.3 प्रतिशत रह गया. नीतीश कुमार ने 2017 में आरजेडी के साथ गठबंधन तोड़ दिया और एनडीए में घर वापसी की. साल  2020 में चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के बगावत करने से जेडीयू जदयू की सीटें और घटकर 43 रह गईं, जिससे 28 सीटों पर उसकी संभावनाओं को नुकसान पहुंचा. उसका वोट शेयर घटकर 15.7 प्रतिशत रह गया.

नीतीश किसी के साथ बना लेते हैं तालमेल 

अब सवाल यह है कि जेडीयू के निराशाजनक प्रदर्शन और विपक्ष के इस दावे के बावजूद की सीएम मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं, नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में मुख्य धुरी बने हुए हैं. ऐसा इसलिए कि वोट बैंक शेयर की वजह से जेडीयू जिस भी पार्टी के साथ गठबंधन करती है, राज्य में सरकार बनाती है. आरजेडी और बीजेपी में किसी पार्टी में इतनी क्षमता नहीं है कि अपने दम पर सरकार बना लें.

जातीय समीकरण नीतीश के पक्ष में 

बिहार के जातिगत समीकरण और सामाजिक परिस्थितियां नीतीश कुमार को सफलतापूर्वक पाला बदलने की के काबिल बनाती है. जाति से कुर्मी होने के नाते उन्होंने महादलितों, कुर्मियों, कोइरियों, अति पिछड़े वर्गों और धार्मिक अल्पसंख्यकों का एक समर्पित कैडर तैयार कर लिया है. यही वजह है कि चाहे वह एनडीए के सहयोगी हो या महागठबंधन के, वह अपने वोट को सहजता से ट्रांसफर करा लेते हैं. आरजेडी और बीजेपी में से खुद की इच्छा के अनुरूप जब चाहे तब गठबंधन बना लेते है. फिर, बिहार के महादलितों और अति पिछड़े वर्गों के लिए विशेष योजनाएं बनाकर लागू करने से जेडीयू का मूल आधार आज बरकरार है.


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Written by: Dhirendra Mishra

13 Aug 2025  ·  Published: 00:39 IST

Ahmedabad Plane Crash: सारे सपने रह गए अधूरे, अब गुडबॉय की अंतिम सेल्फियां देती रहेगी परिजनों को दर्द

राजस्थान के डॉ. जोशी और डॉ. कोमी व्यास परिवार की लास्ट सेल्फी

राजस्थान के डॉ. जोशी और डॉ. कोमी व्यास परिवार की लास्ट सेल्फी

Air India Plane Crash: अहमदाबाद में एयर इंडिया फ्लाइट के दर्दनाक हादसे से जुड़े सुलगते मलबे और सेल्फियां हम सभी के उम्मीद की एक कहानी है. ऐसा इसलिए कि 12 जून को एयर इंडिया विमान हादसा दिल टूटने वाली कहानी में बदल गई. इस घटना से जुड़ी सेल्फियां पीड़ित के परिजनों को हमेशा दर्द को याद दिलाती रहेंगी.

विमान हादसे से पहले की एक सेल्फी ऐसा है जो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए कि बोइंग विमान ड्रीमलाइनर में राजस्थान का एक युवा परिवार सवार था, जो अपने जीवन का एक नया अध्याय शुरू करने लंदन जा रहा था.

पेशे से उदयपुर की डॉ. कोमी व्यास ने हाल ही में पैसिफिक अस्पताल में अपने पद से इस्तीफा दिया था. वह अपने पति डॉ. प्रतीक जोशी, जो रेडियोलॉजिस्ट हैं, से मिलने के लिए लंदन जा रही थीं, जो कुछ महीने पहले ही यूके चले गए थे. उनके साथ उनके तीन बच्चे थे. पांच साल के जुड़वां लड़के नकुल और प्रद्युत और उनकी आठ साल की बेटी मिराया.

इसका जिक्र करना इसलिए जरूरी है कि उड़ान भरने से कुछ ही क्षण पहले डॉ. जोशी ने एक सेल्फी ली जो अब उस याद को ताजा करती है कि क्या खो गया? तस्वीर में वे और डॉ. व्यास गलियारे के एक तरफ से मुस्कुराते हुए दिखाई दे रहे हैं. जबकि उनके बच्चे, जो सामने बैठे हैं, कैमरे की ओर देख रहे हैं. जुड़वाँ बच्चे शर्मीली मुस्कान दे रहे हैं और मिराया के चेहरे की तो देखते ही बनती है.

पैसिफिक अस्पताल के प्रवक्ता जहां दोनों डॉक्टर पहले काम कर चुके थे ने कहा, "वे बहुत खुश थे. कोमी ने आखिरकार विदेश में अपने परिवार के साथ एक नई जिदगी शुरू करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी थी, लेकिन इस दुखद घटना की सूचना मिलने के बाद अस्पताल में हर कोई स्तब्ध हैं."

डॉ. जोशी इस सप्ताह की शुरुआत में अपने परिवार को लंदन ले जाने के लिए बांसवाड़ा लौटे थे. बुधवार को परिवार अपनी फ्लाइट पकड़ने के लिए अहमदाबाद पहुंचे थे. उनके रिश्तेदारों के अनुसार विदाई देने के लिए परिवार के कई सदस्य उनके साथ एयरपोर्ट गए थे. उनके चचेरे भाई नयन ने कहा, "प्रतीक बहुत उत्साहित था. वह इस दिन का लंबे समय से इंतजार कर रहा था." डॉ. कोमी के भाई प्रबुद्ध ने अपनी दस साल की शादी को याद करते हुए कहा, "वे हर मायने में सच्चे साथी थे."

छुट्टी मना खुशी-खुशी इंडिया से वापस जा रहे हैं- स्पिरिचुअल हीलर

डॉक्टर दंपत्ति की तरह अहमदाबाद विमान हादसे में ब्रिटिश कपल फिओंगल गेनलॉ मीक और उनके पति जेमी मीक की भी मौत हो गई. वह स्पिरिचुअल हीलर थे. भारत में छुट्टिया मनाने आए थे. छुट्टी मनाकर वे लंदन वापस अपने घर जा रहे थे. विमान में बैठकर उन्‍होंने एक सेल्‍फी ली और लिखा- "हम भारत से छुट्टियां मनाकर आखिरकार खुशी खुशी घर जा रहे हें. उन्‍होंने संभवत: उन्होंने सोचा नहीं था कि यह उनकी जिंदगी का अंतिम सफर साबित होने जा रहा है."  

संजीव मोदी के 2 जवान बेटे चले गए

इसके अलावा, अहमदाबाद प्लेन क्रैश ने हमसे कई और खुशियों को हमेशा के लिए छीन इनमें उदयपुर के मार्बल व्यवसायी संजीव मोदी के बेटे शुभ मोदी और बेटी शगुन मोदी की मौत हो गई. शुभ और शगुन मोदी अपने पिता का व्यापार संभाल रहे थे और लंदन घूमने जा रहे थे. उदयपुर के ही वल्लभनगर के रूंडेड़ा गांव निवासी वरदीचंद मेनारिया और रोहिड़ा गांव के प्रकाश मेनारिया भी कल हादसे का शिकार हुए. दोनों लंदन में कुकिंग का कार्य करते थे और एक साथ लंदन के लिए रवाना हो रहे थे.

राजस्थान के बालोतरा निवासी  खुशबू राजपुरोहित अपने करियर और भविष्य के सपनों को लेकर लंदन जा रही थीं, लेकिन यह उड़ान उनके जीवन की आखिरी यात्रा साबित हुई. खुशबू  हायर स्‍टडी के लिए लंदन जा रही थीं. परिवार ने बड़े अरमानों से खुशबू को लंदन भेजने की तैयारी की थी. परिवार ने सोचा था कि वह लंदन से पढ़कर एक अलग मुकाम हासिल करेगी. खुशबू के पिता ने एयरपोर्ट पर बेटी को विदा करते हुए एक भावुक फोटो खिंचवाई थी और वॉट्सऐप पर स्टेटस लगाया था, उन्होंने लिखा था 'आशीर्वाद खुशबू बेटा, गोइंग टू लंदन.'  

बता दें कि अहमदाबाद से लंदन जा रहा एयर इंडिया का विमान गुरुवार दोपहर टेक-ऑफ के बाद क्रैश हो गया। हादसे के समय विमान में दो पायलट और 10 केबिन क्रू समेत 242 लोग सवार थे. विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद कई वीडियो भी सामने आए हैं, जो दर्दनाक मंजर को बयां कर रहे हैं.


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Written by: Rajeev

13 Jun 2025  ·  Published: 16:26 IST

इंडिया पर बम, ड्रैगन पर नरमी, क्या चीन से डोनाल्ड ट्रंप को डर लगता है?

डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी

डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार तनाव कम होने के बजाय और ज्यादा बढ़ता जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा पहले घोषित 25 प्रतिशत से काफी अधिक टैरिफ लगाने की धमकी के बीच भारतीय निर्यातकों को अपने सबसे बड़े निर्यात बाजार अमेरिका तक पहुंच बनाए रखने में दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. एक ओर चीन ने दूसरे देशों को पछाड़ने के लिए कीमतों में काफी कटौती शुरू कर दी है तो दूसरी ओर 25 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ के अतिरिक्त जुर्माने ने अमेरिकी आयातकों और भारतीय निर्यातकों के बीच बातचीत को जटिल बना दिया है. खासकर परिधान और जूते जैसे कम मार्जिन वाले उत्पादों के मामले में.

इंडिया-यूएस के बीच रूसी तेल खरीदने पर "जुर्माने" को लेकर अनिश्चितता ऐसे समय में आई है जब भारतीय निर्यातकों को आमतौर पर अमेरिकी कारोबारियों से गर्मियों में सूती कपड़ों, हल्के जूतों और लिनेन के कपड़ों सहित थोक ऑर्डर मिलते हैं. आमतौर पर निर्यातक और आयातक अतिरिक्त टैरिफ का बोझ साझा करते हैं, लेकिन निर्यातकों का कहना है कि अज्ञात जुर्माने की राशि के कारण अनुबंध रुक गए हैं. यहां पर इस बात का जिक्र कर दें कि अमेरिका से भारत को निर्यात 3.46 लाख करोड़ का होता है. जबकि भारत से अमेरिका को निर्यात 7.35 लाख करोड़ रुपये का होता है. 

ट्रंप ने दी टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी

इस मसले पर भारत का रवैया अमेरिकी पक्ष न देखकर सोमवार को तो ट्रंप ने सीएनबीसी के साथ एक साक्षात्कार में अगले 24 घंटों में भारत पर टैरिफ “काफी” बढ़ाने की चेतावनी दी है. उन्होंने कहा कि भारत अभी भी रूसी तेल खरीद रहा है. यह स्पष्ट नहीं है कि नई टैरिफ दर क्या होगी – या वह अब भारत द्वारा वर्षों से किए जा रहे उस कदम पर आपत्ति क्यों जता रहे हैं? हालांकि, यह नई धमकी तब आई है जब उन्होंने पिछले हफ्ते ही भारत से आने वाले सामान पर न्यूनतम 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की थी.

ट्रम्प का कहना है कि भारत अमेरिका से बहुत ज्यादा व्यापार करता है, लेकिन अमेरिका को भारत से उतना फायदा नहीं मिलता. इसलिए उन्होंने भारत पर 25% टैरिफ लगाने का फैसला किया है, यह 7 अगस्त 2025 से लागू हो जाएगा, लेकिन वे इस टैरिफ को अगले 24 घंटों के भीतर और बढ़ाने जा रहे हैं.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि अमेरिका और भारत के बीच व्यापार संतुलन नहीं है और भारत, रूस के साथ व्यापार करके यूक्रेन के खिलाफ रूसी वॉर मशीन को ईंधन देने का काम कर रहा है. इस वजह से अमेरिका को सख्त कदम उठाने की जरूरत है.
 
ट्रंप का रवैया गलत, इंडिया को निशाना बनाना तर्कहीन  

दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत ने इसका विरोध किया है और कहा है कि उसे गलत तरीके से निशाना बनाया जा रहा है और इस कदम को "अनुचित" बताया है.

ऐसे में भारत को निशाना बनाना अनुचित और तर्कहीन है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत को निशाना बनाना गलत है. हम अपने राष्ट्रीय हितों के लिए हर जरूरी कदम उठाएंगे. इसके अलावा, विदेश मंत्री जयशंकर ने भी एक कार्यक्रम में कहा कि दुनिया की व्यवस्था में अब किसी एक का दबदबा नहीं चलेगा.

 अमेरिका खुद खरीद रहा रूस से यूरेनियम - इंडिया  

डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बाद भारत ने पहली बार अमेरिका का नाम लेकर खुलकर जवाब दिया. भारत ने रूस से अमेरिका और यूरोपीय यूनियन (EU) को होने वाले निर्यात का आंकड़ा जारी कर कहा कि अमेरिका अपनी न्यूक्लियर इंडस्ट्री के लिए रूस से यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) इंडस्ट्री के लिए पैलेडियम, फर्टिलाइजर और केमिकल का इम्पोर्ट जारी रखे हुए है. यही हाल EU का है. 

क्या है ट्रंप का टैरिफ वार? 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने  5 मार्च को अमेरिकी संसद के ज्वाइंट सेशन में दुनियाभर के देशों पर टैरिफ लगाने का ऐलान किया था. उन्होंने कहा था कि हमारी इकोनॉमी लगातार घाटे में जा रही है. इस नुकसान से बचने के लिए हम उन सभी देशों पर टैरिफ लगाएं, जो हमारे सामानों पर टैरिफ लगाते हैं. राष्ट्रपति ट्रम्प ने करीब एक महीने बाद 2 अप्रैल को भारत समेत 69 देशों पर टैरिफ लगाने की घोषणा की. यह 9 अप्रैल से लागू होने वाला था, लेकिन ट्रम्प ने तब इसे टाल दिया. अमेरिकी प्रेसिडेंट ने कहा कि वे दुनियाभर के देशों को अमेरिका के साथ समझौता करने के लिए 90 दिनों का वक्त दे रहे हैं.

31 जुलाई को समझौते की तारीख खत्म हो गई. इस दिन ट्रम्प ने 100 से ज्यादा देशों पर टैरिफ लगाया. जिन देशों ने अमेरिका के साथ समझौता किया, उन पर 10 से 20 प्रतिशत टैरिफ लगा और जिन देशों ने ऐसा नहीं किया, उन पर 25 से 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाया. भारत पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगा, क्योंकि उसने ट्रम्प की शर्तें नहीं मानी.

चीन अमेरिका तीसरा सबसे बड़ा साझेदार


अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ को लेकर सबसे ज्यादा घमासान मचा. मई में अमेरिका ने चीन पर 145 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया था. इसके बाद चीन ने अमेरिका पर 125 प्रतिशत जवाबी टैरिफ लगा दिया. बाद में इसमें कमी आई. अभी अमेरिका ने चीन पर 30 प्रतिशत तो चीन ने अमेरिका पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा है.

अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार 2024 में अमेरिका और चीन के बीच कुल वस्तु व्यापार अनुमानित 582.4 अरब डॉलर का था. चीन को अमेरिकी वस्तुओं का निर्यात कुल 143.5 अरब डॉलर था. वहीं, चीन से अमेरिकी वस्तुओं का आयात कुल 438.9 अरब डॉलर था. नतीजा यह है कि पिछले साल चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा 295.4 अरब डॉलर रहा, जो 2023 की तुलना में 5.8 प्रतिशत (16.3 अरब डॉलर) की बढ़ोतरी है. मेक्सिको और कनाडा के बाद चीन, अमेरिका का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन अमेरिका धीरे-धीरे चीनी आयात से खुद को दूर कर रहा है.

अमेरिका, चीन से सिर्फ व्यापार संतुलन नहीं चाहता था. वह चाहता था कि चीन अपनी सरकारी कंपनियों को कम मदद दे. अमेरिका का मानना है कि चीन अपनी सरकारी कंपनियों को बहुत ज्यादा सब्सिडी देता है, जिससे दूसरे देशों की कंपनियां उनका मुकाबला नहीं कर पाती. अमेरिका की यह भी मांग है कि चीन टेक्नोलॉजी में विदेशी कंपनियों को ज्यादा मौका दे और और बौद्धिक संपत्ति के कानून (जैसे पेटेंट आदि) में बदलाव करे. चीन इसके लिए तैयार नहीं हुआ.


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Written by: Dhirendra Mishra

07 Aug 2025  ·  Published: 00:44 IST